भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था – डॉ. जवाहर कर्नावट

हिंदी पत्रकारिता भी आज की तपती धूप की तरह तपकर इस ऊँचाई तक पहुँची है। 30 मई को हिंदी का पहला समाचार पत्र उदण्ड मार्तण्ड निकला था। वह हिंदी पत्रकारिता का बीजारोपण था। हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ सिर्फ समाचार के लिए नहीं होती, वरन् वे उस समाज, देश की संस्कृति और संस्कारों से भी सरोकार रखती है। उपर्युक्त विचार वरिष्ठ साहित्यकार डा. जवाहर कर्नावट महाप्रबंधक बैंक ऑफ़ बड़ौदा, मुंबई ने श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त कर रहे थे। चर्चा का विषय था - ‘‘वर्तमान पत्रकारिता की भाषायी चुनौतियाँ’’।

डॉ. कर्नावट ने 1925 में वृन्दावन में सम्पन्न प्रथम हिंदी संपादक सम्मेलन, स्वतंत्रता आंदोलन में पत्र-पत्रिकाओं की अहम भूमिका, भाषायी मिश्रण, हिंग्लिश का आक्रमण, पत्रकारों को भाषा प्रशिक्षण दिए जाने की जरूरत, हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में भी इंगलिश की घुसपैठ पर सारगर्भित बातें कहीं। उन्होंने कहा कि कभी अखबार पढ़कर हिंदी सीखी जाती थी, पर अब उनमें हिंदी ढूँढना पड़ती है। डॉ. जवाहर कर्नावट ने कहा कि भाषा कोई सरल या कठिन नहीं होती, जरूरत है उसको अपनाने की। आज हिंदी को सरल बनाने के लिए उसको विकृत-अशुद्ध कर परोसा जा रहा है, पर अँगरेज़ी को कोई सरल बनाने की बात नहीं करता। उन्होंने गाँधी, भवनीदास संन्यासी, लाला हरदयाल के साथ फीजी, मॉरीशस, इंग्लैंड आदि देशों की चर्चा की एवं तथ्यात्मक जानकारी दी। इस अवसर पर उन्होंने 22 देशों से निकलने वाली हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के 115 वर्षीय इतिहास को बताया व दिखाया भी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वीणा के संपादक राकेश शर्मा ने कहा कि वर्तमान में भाषायी चुनौतियाँ हैं, पर उनके समाधान भी हैं, जो हम सभी को मन से अपनाने चाहिए। अतिथि परिचय देते हुए संचालन साहित्य मंत्री हरेराम वाजपेयी ने किया एवं आभार प्रदीप नवीन ने माना। अतिथि स्वागत प्रभु त्रिवेदी, संतोष मोहन्ती एवं ओमप्रकाश मीना ने किया। इस अवसर पर डॉ. राजेश वर्मा, हंसा मेहता, आशा-मोहन जाखड़, रूपनारायण गोयल, मौसम राजपूत, चंद्रशेखर विरथरे, सचिन तिवारी सरला गलाण्डे, राजेश शर्मा, वर्षा तारे, ज्ञानेश, जयप्रकाश तिवारी (देवास), कमलेश पांडे, प्रणव व्यास, नारायण जोशी, हेमेन्द्र मोदी, जुगलकिशोर बैरागी, अनिल कटारे, विजय सिंह आदि उपस्थित थे।

- अरविन्द ओझा, प्रचारमंत्री

श्रद्धांजलि...मालवी की बाँसुरी - सुल्तान मामा

हिंदी और मालवी के सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार सुल्तान मामा हिंदी काव्य मंचों पर अपनी सुरीली आवाज के लिए पहचाने जाते थे। मालवी लोक भाषा की बाँसुरी थे मामा। ग्रामीण अंचलों में उनकी सुरीली आवाज का जादू इस तरह छाया हुआ था कि उनके द्वारा गाए हुए गीतों को महिलाएं अपने घरों में होने वाले मांगलिक अवसर शादी, विवाह, सगाई , मामेरा, होली, देवी- देवता आदि के विभिन्न रस्मों में गाने लगी थीं। 2 मार्च, 1928 को उज्जैन के तराना में जन्मे सुल्तान अहमद खान मालवी और मालवा की शान माने जाते थे । कांग्रेस की राजनीति और कविता के साथ आपने जीवन की यात्रा की और आखरी सांस तक दोनों को जी भर के जीया। आप तराना नगर पालिका के अध्यक्ष भी रहे । कवि सम्मेलनीय पारी की शुरुआत 1955 में मालवी के प्रसिद्ध कवि हरीश निगम के सान्निध्य में शुरु की जो अंतिम पड़ाव तक रही। सुल्तान अहमद खान के सुल्तान मामा बनना भी रोचक है। कवि हरीश निगम की पत्नी ने उन्हें भाई बनाया था और जब वे निगम जी के घर जाते तो बच्चे कहते मामा आए। बच्चों के मामा जगत मामा बन गये और धीरे धीरे उनकी पहचान सुल्तान मामा के रुप में ही हो गई। वे गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रतीक थे। स्वयं मुसलमान हो कर भी उन्होने हिंदू देवी देवताओं पर गीत लिखे और गाए। आकाशवाणी पर अनेक बार रचनापाठ कर चुके, देश भर के मंचों पर उनकी कविताएं चाव से सुनी जाती रही। इंदौर दूरदर्शन ने तराना आकर मामा पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई।  मामा सही अर्थों में जनकवि थे। छह दशक से अधिक समय तक मंचों की शान रहे सुल्तान मामा 27 मई, 2019 को दूनिया को मोहब्बत के तराने दे कर अलविदा हो गये। मालवी की बांसुरी मामा को विनम्र श्रद्धांजलि...

- अरविन्द ओझा, प्रचारमंत्री



श्रद्धांजलि...कवि मोहनजी सोनी

साहित्य को अपना धर्म ओर कविता को अपना कर्म मानने वाले साथ ही मालवी और हिंदी के यश को काव्य मंचों पर प्रसारित करने वाले  कवि मोहनजी सोनी दिनांक 18 जून, 2019 को अनन्त की यात्रा पर निकल गये। आपका जन्म 23 मई, 1938 को हुआ। दादा मोहन सोनी को लोकमानस अकादमी, शब्द प्रवाह साहित्य मंच, म.प्र लेखक संघ, दैनिक अग्निपथ,  श्रीनिवास जोशी, हिंदी साहित्य समिति इंदौर जैसी संस्थाओं ने अपने प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किए। म.प्र. विधान सभा में भी आपने काव्यपाठ किया। आजीविका हेतु आप शिक्षक थे, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद भी आपने शिक्षक की भूमिका नहीं छोड़ी थी। सोनी जी कि  कमी मालवा के काव्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति इंदौर उनकी दिव्यात्मा को परम शांति मिले यही प्रभु से कामना। अरविंद ओझा, प्रचार मंत्री, मो. 9425056433