संवेदनहीन हो रहे समाज में लेखकों की चिंताएं

यह जमाना ‘यूज एंड थ्रो’ का है। इसलिए मानवीय समाज में संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है। मनुष्यों के संबंधों में गिरावट आई है। इस गिरावट को एक संवेदनशील लेखक कैसे लिखे? लेखकों की चिंताएँ गहराती जा रही हैं। ये विचार प्रो. उषा चंदेल ने सुप्रसिद्ध लेखक प्रो. सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी की पुस्तक ‘बदलती हवाएँ’ के विमोचन अवसर पर व्यक्त किये। वे कार्यक्रम के अध्यक्ष के रूप में बोल रही थीं।

पुस्तक पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ कहानीकार श्री भालचंद्र जोशी ने कहा कि समाज में बदलाव बहुत तेजी से आया है क्योंकि बाजार ने घर तक प्रवेश पा लिया है। अब चीजें जरूरत के हिसाब से नहीं बल्कि फैशन के मान से खरीदी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी गाँव से कट गई है। इसलिए ग्रामीण संवेदना पर बहुत कम साहित्य रचा जा रहा है। श्री आशुतोष दुबे ने कहा कि प्रो. चतुर्वेदी केवल क्रिकेट के लेखक ही नहीं हैं, बल्कि उनके पास बहुत संवेदनशील दृष्टि है, जो समाज में आ रहे परिवर्तनों को देखती है और उन्हें शब्द देती है। जो लेखक जितना अनुभव संपन्न होगा, वह उतना ही अच्छा लेखक बनेगा। उन्होंने प्रो. चतुर्वेदी के अध्यापकीय कौशल को भी याद किया और कहा कि उनका छात्र होना मेरे लिए गौरव की बात है।
प्रो. सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने अपने अध्यापकीय अनुभव और लेखक के रूप में प्राप्त अनुभवों को श्रोताओं के समक्ष रखा और कहा कि कुछ परिवर्तन सुखद होते हैं, लेकिन कुछ परिर्वतन मनुष्य की संवेदना को झकझोरते हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तकालयों से पाठकों का गायब हो जाना एक दुर्घटना है जो यह संकेत देती है कि पुस्तकों के प्रति हमारा अनुराग निरंतर कम हो रहा है। यह भविष्य के लिए सुखद संकेत नहीं है। प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत सर्वश्री देवकृष्ण साँखला, राकेश शर्मा, अरविंद जवलेकर, अरविंद ओझा और डॉ. मीनाक्षी स्वामी ने किया। कार्यक्रम का संचालन श्रीमती शोभा जैन ने किया और आभार सदाशिव कौतुक ने माना।

- अरविंद ओझा, प्रचार मंत्री